Class 11 Physics Chapter 11 Notes in Hindi द्रव्य के तापीय गुण

यहाँ हमने Class 11 Physics Chapter 11 Notes in Hindi दिये है। Class 11 Physics Chapter 11 Notes in Hindi आपको अध्याय को बेहतर ढंग से समझने में मदद करेंगे और आपकी परीक्षा की तैयारी में सहायक होंगे।

Class 11 Physics Chapter 12 Notes in Hindi ऊष्मिय गुण

ऊष्मिय गुण:- ताप किसी वस्तु का एक आपेक्षिक अनुभव है ऊष्णता या शीतलता का ।

जब दो भिन्न -भिन्न ताप वाली वस्तुओं को आपस में जोड़कर एक निकाय बनाया जाता है तो दोनों वस्तुओं के मध्य- ऊष्मा का आदान-प्रदान होता है। यह ऊष्मा का आदान – प्रदान तब तक चलता है जब तक दोनों वस्तुओं का ताप समान न हो जावें । ताप समान होने की स्थिति में दोनों के मध्य ऊष्मा का आदान-प्रदान बंद हो जाता है। यह स्थिति ऊष्मीय साम्य कहलाती है।

Note:-

  1. ऊष्मा सदैव उच्च ताप से निम्न ताप की ओर बहती है।
  2. ताप किन्हीं दो वस्तुओं के मध्य ऊष्मीय साम्य का बोध कराता है।

ऊष्मा

ऊष्मा किसी वस्तु में निहित ऊर्जा होती है जो वस्तु के ताप को घटाती या बढ़ाती है।

किसी वस्तु के एकांक आयतन की ऊष्मा जितनी अधिक होगी उस वस्तु का ताप उतना ही अधिक होता है।

ताप का मापन

ताप का मापन करने के लिए एक ऐसे उपकरण की आवश्यकता होती है जो विभिन्न विभिन्न परिस्थितियों में ताप का यथार्थ मापन कर सके। ताप का मापन जिस उपकरण से किया जाता है उसे थर्मामीटर कहते है। थर्मामीटर में प्रयुक्त किया जाने वाला पदार्थ पारा होता है।

थर्मामीटर में प्रयुक्त किया जाने वाला पदार्थ जिसकी निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए :-

  • चमकीला होना चाहिए जिससे सुस्पष्ट दिखाई देवे ।
  • काँच से चिपकना नहीं चाहिए।
  • इसका ऊष्मीय प्रसार गुणांक अधिक होना चाहिए ताकि यह कम ऊष्मा पाकर भी फैल जावें।

इन सब बातों का ध्यान रखते हुए हम थर्मामीटर में पारे का उपयोग करते है जिसका हिमांक बिन्दू  – 39°C व क्वथनांक बिन्दु 537°C होता है।

विभिन्न ताप पैमाने :-

  • °C ताप पैमाना:- इस ताप पैमाने में निम्नतम / हिमांक बिन्दू 0°C तथा उच्चतम / क्वथनांक बिन्दू 100°C होता है। इस ताप पैमाने को 100 समान भागों में बाँटा जाता है। प्रत्येक भाग का मान 1°C होता है।
  • K ताप पैमाना:- इस ताप पैमाने में निम्नतम बिन्दू / हिमांक बिन्दू 273.15 K तथा उच्चतम बिन्दू/क्वथनांक बिन्दू 373.15K होता है। इस ताप पैमाने को भी 100 समान भागों में बाँटा जाता है। प्रत्येक भाग का मान 1 K होता है। 1°C और 1 K भाग का मान समान होता है।
  • °F ताप पैमाना:- इस ताप पैमाने में निम्नतम / हिमांक बिन्दू 32°F तथा उच्चतम / क्वथनांक बिन्दू 212°F होता है। इस ताप पैमाने को 180 समान भागों में बाँटा जाता है। प्रत्येक भाग का मान 1°F होता है।
    • 1°C > 1°F
  • रयूमर [ °R ] ताप पैमाना :- इस ताप पैमाने में निम्नतम / हिमांक बिन्दू 0°R तथा उच्चतम / क्वथनांक बिन्दू 80°R होता है। इस ताप पैमाने को 80 समान भागों में बाँटा जाता है तथा प्रत्येक भाग का मान 1°R  होता है।
    • 1°R >1°C

विभिन्न ताप पैमानों के मध्य सम्बन्ध :-

विभिन्न ताप पैमानों के मध्य सम्बन्ध

ऊष्मीय प्रसार

जब कोई पदार्थ ऊष्मा पाकर फैलता है तो उसे ऊष्मीय प्रसार कहा जाता है।

यह तीन प्रकार का होता है:-

  • रेखीय प्रसार
  • पृष्ठीय (क्षेत्रीय) प्रसार
  • आयतन प्रसार

Chapter 2: मात्रक और मापन
Chapter 3: सरल रेखा मे गति
Chapter 4: गति के नियम
Chapter 6: कार्य, शक्ति एवं ऊर्जा
Chapter 7: कणों के निकाय तथा घूर्णी गति
Chapter 10: तरल पदार्थों के यांत्रिक गुण
Chapter 14: दोलन गति

1. रेखीय प्रसार (Leanear Extension)

जब कोई पदार्थ ऊष्मा पाकर केवल अपनी लम्बाई में परिवर्तन करता हो, बाकी विमाएँ अपरिवर्तित हो तो इसे रेखीय प्रसार कहा जाता है।

Lt = Lo(1 + αΔt)

अंतिम लंबाई = आरंभिक लंबाई (1+ प्रसार गुणांक x तापान्तर)

किसी छड़ के एकांक लम्बाई में, ताप 1°C बढाने पर उसकी लम्बाई में होने वाला परिवर्तन, रेखीय प्रसार गुणांक [α] कहलाता है।

3. आयतन प्रसार

Vt = Vo[1+ βΔT]

अंतिम आयतन = आरंभिक आयतन [1+ प्रसारगुणांक x तापांतर]

“किसी घन या घनाभ के एकांक आरंभिक आयतन का ताप 1℃ बढाने पर आयतन में होने वाला परिवर्तन, आयतन प्रसार गुणांक [β] कहलाता है।”

α व β में सम्बन्ध :-

3α = β

समान्यत α एक बहुत ही छोटा होता है। लोहे के लिय इसका मान α = 0.000012/°C होता है।

पानी का असंगत प्रसारः-

सामान्यत: हम देखते है कि किसी वस्तु का ताप बढाने पर उसका आयतन सदैव बढता है किन्तु जल कुछ अलग गुण दर्शाता है। पानी का ताप 0°c से 4°c तक बढाने पर इसका आयतन घटता है व 4°c के बाद ताप बढाने पर उसका आयतन बढने लगता है। इसे पानी का असंगत प्रसार कहा जाता है।

ऊष्माधारिता

कोई पदार्थ जब ऊष्मा ग्रहण करता है तो उसके ताप में वृद्धि होती हैं या जब कोई पदार्थ ऊष्मा परित्याग करता है तो उसके ताप में कमी होने लगती है । ताप में होने वाली यह वृद्धि या कमी ग्रहण या परित्याग की गयी उष्मा पर निर्भर करती है।

\(S = \frac{Q}{Δt}\)

परिभाषा :-

यदि Δt=1℃ तो S = Q

“किसी पदार्थ के ताप में 1℃ का परिवर्तन करने पर ग्रहण, या परित्याग की गयी ऊष्मा, ऊष्मा धारिता कहलाती है।” यह पदार्थ के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करती है।

विशिष्ट ऊष्मा धारिता

किसी एकांक द्रव्यमान वाले पदार्थ की ऊष्मा धारिता उस पदार्थ की विशिष्ट ऊष्मा धारिता [S] कहलाती है।

\(S = \frac{Q}{MΔt}\)

परिभाषा

“एकांक द्रव्यमान वाले पदार्थ के ताप में 1°C का परिवर्तन करने पर ग्रहण या परित्याग की गयी ऊष्मा, विशिष्ट ऊष्मा धारिता कहलाती है।” यह पदार्थ के द्रव्यमान पर निर्भर करती है।

तापीय प्रतिबल

जब एक लोहे की छड़ को किसी माध्यम में कसकर गर्म किया जाये तो यह ऊष्मा पाकर फैलने लगती है। चूँकि हमने इसकी लंबाई में होने वाली वृद्धि को रोक दिया है तो यह ऊष्मा पाकर हल्की-सी मध्य भाग से मुड़ जाती है।

ऊष्मा संचरण

ऊष्मा का संचरण जिसका शाब्दिक अर्थ ऊष्मा का एक निश्चित दिशा में बहना । ऊष्मा सदैव उच्च ताप वाली वस्तु से निम्न ताप वाली वस्तु की और बहने लगती है। ऊष्मा संचरण की निम्नलिखित तीन विधियाँ पायी जाती है :-

  • चालन विधि (Conduction Method)
  • संवहन विधि 
  • विकिरण विधि

1. चालन विधि

ऊष्मा संचरण की इस विधि में माध्यम के कण बिना अपनी जगह को छोड़े अपनी साम्यावस्था के ईद-गिर्द कंपन करते हुए ऊष्मा को अपने से अगले वाले कण को स्थानान्तरण करते है |

” एकांक आरंभिक लंबाई की एक चालक छड़ तथा एकांक अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल के ताप में 1°C का परिवर्तन किया जाए तो ऊष्मा संचरण की दर, ऊष्मा चालकता गुणांक [K] कहलाती है।”

2. संवहन विधि

Note:- यह विधि गैसों के लिए भी लागू होती है।

  • किसी बंद कमरे में अगरबत्ती जलाने पर उसकी महक सभी  जगह फैल जाती है।
  • घरों में खिड़कियाँ नीचे व रोशनदान हमेशा ऊपर बनाए जाते है क्योंकि गर्म हवा हल्की होने के कारण ऊपर उठकर रोशनदान से बाहर निकल जाए व घर के बाहर ठंडी हवाएँ जो कि भारी होती है खिड़की के माध्यम से अंदर की ओर आ जाए।

जल हवाएँ

गर्मियों के दिनों में दिन के समय समुद्र के पास स्थित थल जल की तुलना में अधिक गर्म होते है जिसके कारण थल पर स्थित हवा हल्की होकर ऊपर उठने लगती है, उसी समय जल पर  स्थित हवा जो कि भारी होती है वह थल की ओर आने लगती है। जिसके कारण वहाँ खड़े व्यक्तियों को ठंडी हवा महसूस होती है।

 “जल से थल की ओर बहने वाली हवाएँ “

थल हवाएँ

रात के समय थल जल की तुलना में अत्यधिक ठंडे रहते है, जिसके कारण जल पर  स्थित हवा गर्म होने के कारण  हल्की होकर ऊपर उठने लगती है, उसी समय थल से हवाएँ बहकर जल की ओर आने लगती है, थल हवाएँ कहलाती है।

“थल से जल की ओर बहने वाली हवाएँ”

व्यापारिक हवाएँ:-

व्यापारिक हवाएँ:-

सूर्य से आने वाली प्रकाश की किरणें भूमध्य रेखा पर सीधी पड़ती है जबकि पृथ्वी के North व South – Pole पर तिरछी पड़ने के कारण यहाँ पर तापमान कम होता है। भूमध्य रेखा पर तापमान अधिक होने के कारण वहाँ की हवा हल्की होकर ऊपर उठती है, उसी समय N व S-Pole से हवाएँ बहकर भूमध्य रेखा की ओर आने लगती है, इन्हीं हवाओं को व्यापारिक हवाएँ कहते है।

3. विकिरण विधि:-

ऊष्मा संचरण की चालन व संवहन विधि में ऊष्मा का संचरण कणों के माध्यम से होता है किन्तु विकिरण विधि में ऊष्मा का संचरण बिना कणों के होता है।

एक ठोस पिंड को गर्म करने के पश्चात् किसी वातावरण में रख दिया जाता है ,कुछ समय पश्चात हम देखते है कि उस पिण्ड का ताप कम होने लगता है। उस पिण्ड में से ऊष्मा विकिरण के माध्यम से बाहर निकलती है व ये विकिरणें विद्युत चुंबकीय तरंगें कहलाती है।

विद्युत चुंबकीय तरंगें वे तरंगें होती है जिनका वेग प्रकाश के वेग 3×108m/sec के समान होता है। उत्सर्जित होने वाली यह विकिरणें अलग-अलग λ  की होती है।

“वैज्ञानिक स्टीफन के अनुसार उत्सर्जित होने वाली विकिरणों की ऊष्मा Q पिंड के परमताप T के चर्तुघात के समानुपाती होती है। इसे स्टीफन का नियम कहा जाता है।

                                         Q ∝ T4

उत्सर्जित होने वाली विकिरणों की λ परमताप के व्युत्क्रमानुपाती  होती है; इसे वीन का नियम भी कहा जाता है।    λ ∝ 1/T

न्यूटन के शीतलन का नियम

यह नियम विकिरण विधि पर आधारित होता है, न्यूटन के अनुसार जब किसी पिण्ड को गर्म करने के पश्चात वातावरण में रख दिया जाए तो वह अपने में से कुछ ऊष्मा विकिरणों के रूप में बाहर उत्सर्जित करने लगता है जिसके कारण उसके ताप में पतन होने लगता है। इसे ही न्यूटन का शीतलन का नियम कहा जाता है।

न्यूटन के शीतलन नियम के लागू होने की शर्तें:-

  • उत्सर्जक पृष्ठ काला होना चाहिए।
  • पिण्ड तथा वातावरण के मध्य तापान्तर अत्यधिक नहीं होना चाहिए।
  • पिण्ड से ऊष्मा का उत्सर्जन विकिरण के रूप में होना चाहिए।

Note:-

  • यदि कोई पृष्ठ काला है तो उस पर विकिरणें आपतित करने पर उसका ताप बढ़ जाता है। अर्थात् काले रंग अत्यधिक विकिरणें अवशोषित करने वाले होते है।
  • ठंड के समय लोग गहरे रंग के कपड़े पहनना ज्यादा पसंद करते है।
  • गर्मियों के दिनों में लोग सूती हल्के रंग के कपड़े पहनना ज्यादा पसंद करते है क्योंकि यह ऊष्मा के कम अवशोषक होते है।
  • घरों में खाना बनाने वाले बर्तनों का पेंदा काले रंग का होता है  क्योंकि वह कम समय में अत्यधिक ऊष्मा ग्रहण कर सके।

कैलोरीमिती

एक ऐसा उपकरण जिसकी सहायता से किसी पदार्थ की ऊष्मा का मापन किया जाता है, कैलोरीमिती कहलाता है।

अवस्था में परिवर्तन (Change in state)

पदार्थ की मूलभूत तीन अवस्थाएँ होती है :-

  1. Solid
  2. Liquid
  3. Gas

1. Solid:- इनमें अणुओं के बीच की दूरी बहुत कम होती है व अणुओं के मध्य लगने वाला आकर्षण बल बहुत अधिक होता है तथा आकार निश्चित होता है।

2. Liquid:-  Liquid के कणों के बीच की दूरी ठोसों के कणों के बीच की दूरी से अधिक होती है व कार्य करने वाला आकर्षण बल भी उतना प्रबल नहीं हो पाता है। इनका आकार व आकृति निश्चित नहीं होती है।

3. Gas:- Gases में अणुओं के बीच की दूरी अत्यधिक तथा कार्य करने वाला आकर्षण बल दुर्बल आकर्षण बल होता है, इनका आकार भी निश्चित नहीं होता है।

  • सामान्यत: किसी भी पदार्थ को ऊष्मा देने पर उसके ताप में परिवर्तन होता है।
  • जब कोई Solid ऊष्मा पाकर Liquid में परिवर्तित होता है तो इसे  इसकी अवस्था   परिवर्तन कहा जाता है।
  • “अवस्था में होने वाला यह परिवर्तन नियतताप पर होता है”।
  • जब किसी नियत ताप पर कोई Liquid गैसीय अवस्था में परिवर्तित होता है तो इसे  क्वथनांक कहा जाता है।
  • जब कोई  Gas नियत ताप पर liquid में परिवर्तित होती है इसे संघनांक कहते है व उस बिन्दू को संघनन बिन्दू कहते है।
  • जिस बिन्दू पर कोई Liquid, Solid में परिवर्तित होता है, हिमांक कहलाता है व वह  बिन्दू हिमांक बिन्दू कहलाता है।
  • इसका ठीक उल्टा अर्थात् जब कोई Solid, Liquid में परिवर्तित होता है तो गलनांक कहलाता है ।
  • इन सभी स्थितियों में पदार्थ ऊष्मा ग्रहण या परित्याग करता है (नियत ताप पर ) यह इनकी अवस्था परिवर्तन कहलाती है।
  • “सामान्यतः गलनांक व हिमांक बिन्दू एक ही होते है। “
  • जब कोई पदार्थ ठोस अवस्था से सीधे ही Liquid में परिवर्तित हुए बिना सीधे गैसीय अवस्था में परिवर्तित हो जाते है, ऐसा करना उर्ध्वपातन कहलाता है |

गुप्त ऊष्मा (Latent Heat):- जब कोई पदार्थ ऊष्मा ग्रहण कर या परित्याग कर अपनी अवस्था को परिवर्तित करता है तो यह ग्रहण या परित्याग की गयी ऊष्मा उस पदार्थ की गुप्त ऊष्मा कहलाती है।

”गुप्त ऊष्मा के समय पदार्थ का ताप सदैव नियत रहता है। अर्थात् यह पदार्थ के ताप को बढाने में काम नहीं आती ।”

– ग्रहण की गयी यह ऊष्मा Q, पदार्थ के द्रव्यमान m के समानुपाती होती है।

                               Q = Lm                    [ L→गुप्त ऊष्मा (गुणांक) ]

\(L=\frac{Q}{m}\)

इकाई –   जूल/किग्रा = JKg-1 = ” kcal./Kg.

गुप्त ऊष्मा दो प्रकार की होती है :-

  1. गलन की गुप्त ऊष्मा [Lf]
  2. वाष्पन की गुप्त ऊष्मा[Lv]

1. गलन की गुप्त ऊष्मा :-

                     \(L_f=\frac{Q_f}{m}\)

                     L= JKg-1

” किसी एक gm Solid को Liquid में परिवर्तित करने के लिए दी गयी ऊष्मा उसकी गलन गुप्त ऊष्मा कहलाती है।”

2. वाष्पन की गुप्त ऊष्मा:-

                     \(L_v= \frac{Q_v}{m}\)

                     Lv = JKg-1

”किसी एक gm Liquid को वाष्प में या गैसीय अवस्था में परिवर्तित करने के लिए दी गयी ऊष्मा, वाष्पन की गुप्त ऊष्मा कहलाती है।

– वाष्प की वाष्पन गुप्त ऊष्मा Lv = 540 cal./g

त्रिक बिन्दू:- वह बिन्दू जहाँ पर किसी भी पदार्थ की तीनों अवस्थाएँ (Solid, Liquid व Gas) साम्य अवस्था में हो। जल के लिए त्रिक बिन्दू का मान 0.01°C या 273.16K होता है।

आदर्श कृष्णिका या कृष्णिका विकिरण:-

एक ऐसा पिण्ड जिसकी अंदर व बाहर वाली सतह काली होती है जब इस पर भिन्न -भिन्न λ    की विकिरणें आपतित की जाती है तो यह उन विकिरणों को पूर्ण रूप से अवशोषित कर लेता है, इसलिए इसका अवशोषण गुणांक a = 1 है तथा पारगमन या पारगम्य गुणांक/ उत्सर्जन गुणांक शून्य होता है।

अवशोषण क्षमता (aλ):-

जब भिन्न -भिन्न स्पेक्ट्रमी परास की विकिरण कृष्णिका पर आपतित की जाती है तो जितनी विकिरण यह अवशोषित करता है, आपतित विकिरण की तुलना में, अवशोषण गुणांक (aλ) कहलाता है।

अवशोषण क्षमता (aλ):-

उत्सर्जन क्षमता [eλ]

जब किसी परिवेश के निश्चित ताप पर किसी पिण्ड पर भिन्न-भिन्न λ,λ+dλ  एकांक स्पैक्ट्रमी खंड की विकिरणें आपतित की जाए तो उस पिण्ड से प्रति Sec. प्रति एकांक क्षेत्रफल से उत्सर्जित होने वाली ऊष्मा उस पिण्ड की उत्सर्जन क्षमता [eλ] कहलाती है।

                               eλ = Q/dλ

                               Q = eλ

एक कृष्णिका के लिए उत्सर्जन क्षमता eλ होती है।

Note:- 

  • आदर्श कृष्णिका के लिए अवशोषण क्षमता  aλ = 1 होता है।
  • भिन्न-भिन्न स्पेक्ट्रमी पिण्ड की उत्सर्जन क्षमता eλ व आदर्श कृष्णिका की उत्सर्जन क्षमता Eλ का अनुपात  उत्सजर्कता या आपेक्षिक उत्सर्जन क्षमता एप्सलॉन  कहलाता है।

किरचॉफ का नियम

भिन्न -भिन्न स्पेक्ट्रमी पिण्ड की उत्सर्जन क्षमता eλ  व उसी परिवेश के ताप पर पिण्ड की अवशोषण क्षमता  aλ  का अनुपात सदैव नियत होता है। जो कि Eλ के बराबर होता है।

eλ/aλ = नियत = Eλ

फाऊन हॉफर रेखाएँ

सूर्य के मध्य भाग का ताप लगभग 108 K होता है जिसे प्रकाश मण्डल कहा जाता है। इस प्रकाश मण्डल के आसपास उपस्थित प्रकाश वाले भाग को वर्णमण्डल कहा जाता है जिसका ताप लगभग 6000 K होता है। प्रकाश मण्डल से निकलने वाला प्रकाश भिन्न-भिन्न  λ   विकिरणों का होता है।

यह प्रकाश जब वर्णमण्डल में पहुँचता है तो वर्ण- मण्डल में उपस्थित कुछ कण कुछ विभिन्न -विभिन्न  λ  की विकिरणों का अवशोषण कर लेते है। वर्ण मण्डल से जब यह प्रकाश पृथ्वी की सतह पर पहुँचता है तो उस समय उन अवशोषित विकिरणों की जगह पर काली रेखाएँ प्राप्त होती है। जिन्हें फाऊन हॉफर रेखाएँ कहा जाता है।

सूर्यग्रहण के समय जब चन्द्रमा, सूर्य व पृथ्वी के बीच में आ जाता है तो इस स्थिति में केवल वर्णमण्डल द्वारा अवशोषित किया गया प्रकाश पृथ्वी पर पहुँचता है।

वीन का नियम

वीन के अनुसार जब किसी पिण्ड को उच्च ताप पर गर्म कर वातावरण में रखा जाता है तो उस पिण्ड से कुछ भिन्न-भिन्न  λ  की विकिरणें उत्सर्जित होने लगती है इन उत्सर्जित विकिरणों में अधिकतम तरंगदैर्ध्य की विकिरण  λm  अपने पिण्ड के परमताप  T  के व्युत्क्रमानुपाती होती है, यही वीन का नियम कहलाता है |

स्टीफन का नियम:- (1879)

स्टीफन के अनुसार जब किसी पिण्ड को गर्म करने के पश्चात् वातावरण में रखा जाता है तो उस पिण्ड से प्रति एकांक समय तथा प्रति एकांक क्षेत्रफल से उत्सर्जित होने वाली विकिरण की ऊर्जा पिन्ड के परमताप की चर्तुघात के समानुपाती है।

वैज्ञानिक बोल्टमेन ने (1884) स्टीफन के नियम पर अध्ययन करने के पश्चात बताया कि यह नियम केवल कृष्ण पिण्डों के लिए या आदर्श कृष्णिका के लिए ही लागू होता है।

उसके पश्चात वैज्ञानिक प्रीवोस्ट के ऊर्जा विनिमय के अनुसार यह कहा गया कि यदि किसी कृष्ण पिण्ड को उच्च ताप वाले वातावरण में अर्थात् जिसका ताप पिण्ड के ताप से भी अधिक है में रखा जाता है तो ये कुछ विकिरणें अवशोषित करने लगता है। यदि पिण्ड को निम्नताप के वातावरण में रखा जाए तो यह अपने में से कुछ विकिरणें उत्सर्जित करने लगता है।

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