Class 12 Biology Chapter 13 Notes in Hindi जीव और समष्टिया

यहाँ हमने Class 12 Biology Chapter 13 Notes in Hindi दिये है। Class 12 Biology Chapter 13 Notes in Hindi आपको अध्याय को बेहतर ढंग से समझने में मदद करेंगे और आपकी परीक्षा की तैयारी में सहायक होंगे।

Class 12 Biology Chapter 13 Notes in Hindi

  • जीव:- पर्यावरण मे पाये जाने वाले जीवित घटक को जीव कहते है।
  • समष्टि:- एक ही जाति के जीवो के समूह को समष्टि कहा जाता है।
  • समुदाय:- एक से अधिक समष्टियो के समूह को समुदाय कहते है।
  • पारिस्थितिक तंत्र या पारितंत्र:- एक से अधिक समुदायो के समूह को पारिस्थितिक तंत्र कहते है।
  • जीवोम:- एक से अधिक पारिस्थितिक के समूह को जीवोम कहते हैं।
  • जैव- मण्डल:- एक से अधिक जीवोम के समूह को जैव- मण्डल कहते है।

जीव और इसका पर्यावरण

पर्यावरण:- पर्यावरण दो शब्दो परि + आवरण से मिलकर बना हुआ है। यहाँ परि का अर्थ ‘चारों ओर’ से तथा आवरण का अर्थ ‘ढके हुए’ से है।

जीवो के चारों ओर का वह क्षेत्र, जो उन्हे घेरे रहता है तथा उसकी जैविक क्रियाओ पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं, उन्हें पर्यावरण कहते हैं

पर्यावरणीय कारक:- पर्यावरण के वे घटक जो जीवो को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं, पर्यावरणीय कारक कहलाते है।

पर्यावरणीय कारक के प्रकार:- पर्यावरणीय कारक को मुख्यत दो भागो में बाटा गया है:-

(1) जैविक कारक:- इसके अन्तर्गत सूक्ष्म जीव-जन्तु व पादप आदि घटक आते है।

(2) अजैविक कारक:- इसके अन्तर्गत भूमि, जल, ताप, प्रकाश तथा विकिरण आदि घटक आते है।

प्रमुख अजैव कारक को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है:-

(i) जलवायु सम्बन्धी कारक:- किसी विशेष स्थान पर होने वाली सभी वातावरणीय गतिविधियो को उस स्थान की जलवायु कहते है। जलवायु के अध्ययन को जलवायु विज्ञान कहते है। इसमे निम्न कारक आते है:-

(a) प्रकाश:- पौधो की जैविक क्रियाओ के लिए प्रकाश भी एक महत्त्वपूर्ण कारक है। जीवो के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सूर्य से ही प्राप्त होती है। प्रकाश अपने गुण, तीव्रता तथा अवधि के द्वारा पौधो को प्रभावित करता है। इसका जन्तुओ पर भी प्रभाव पड़ता है।

प्रकाश का पौधो पर प्रभाव

  • हरे पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में प्रकाश – संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन अर्थात कार्बोहाइड्रेटस का निर्माण करते हैं।
  • रन्ध्रो के खुलने एवं बन्द होने की प्रक्रिया पर भी प्रकाश का प्रभाव पड़ता है, जिससे पौधो के वाष्पोत्सर्जन की दर का निर्धारण होता है।
  • पौधो की वृद्धि, एन्जाइम का बनना, ऊतक का विभेदन, पुष्पन, पादप हार्मोन का संवहन पौधी के अंगो के मुडने आदि पर भी प्रकाश का प्रभाव पड़ता है।
  • पौधो द्वारा प्रकाश के तीव्रता के अनुरूप गति प्रदर्शित करना प्रकाशानुवर्तन गतियाँ कहलाती है।

दीप्तिकालिता

पौधो की कार्यिकी, आकारीकी एवं पारिस्थितिकी पर प्रकाश के अवधि के प्रभाव को दीप्तिकालिता कहते है। दीप्तिकालिता के आधार पर पौधों को निम्न प्रकारों में बाँटा गया है।

प्रकाश प्रिय:- वे पादप जो प्रकाश मे भली-भाँति किन्तु छाया मे अच्छी प्रकार से नही उग पाते है, उन्हें प्रकाश प्रिय कहते हैं। उदाहरण- सूरजमुखी, सागौन, बरगद आदि ।

छाया प्रिय – वे पादप जो केवल छायादार स्थानो मे ही अच्छी प्रकार से उगते है, अधिक प्रकाश मे ये मुरझा जाते है, उन्हे छाया प्रिय कहते है। उदाहरण एबीस, टेक्सस आदि ।

(b) तापमान:- तापमान अति महत्त्वपूर्ण कारक है। यह पौधों मे बीजो के अंकुरण, वृद्धि पुष्पन, श्वसन, प्रकाश – संश्लेषण आदि वायु की गति, जलवृद्धि, समुद्री धाराओ का संचालन एवं अनेक क्रियाओ को प्रभावित करता है। प्रत्येक जीव को अनुकूलतम ताप की आवश्यकता होती है।

(c) जल:- पृथ्वी के लगभग 73% भाग पर जल पाया जाता है। पादपो की वृद्धि एवं विकास जल की प्राप्ति पर निर्भर करता है। पृथ्वी की सतह व वातावरण के बीच दो क्रमिक घटनाएँ वाष्पोत्सर्जन वर्षा होती है। जिसके कारण निरंतर रूप से जल का विनिमय एक चक्र के रूप मे होता है, जिसे जल-चक्र कहते है।

जल का पौधो पर प्रभाव

जल की उपलब्धता के आधार पर पौधो को तीन भागो मे बाँटा गया है:-

  • जलोद्‌भिद:- नम क्षेत्रो मे रहने वाले पौधे जलोद्‌भिद कहलाते है।
  • समोद्‌भिद:- अनुकूल नमी व वायु मे उगने वाले पौधे समोद्‌भिद कहलाते है।
  • मरुद्‌भिद:- शुष्क क्षेत्र मे उगने वाले पौधे मरुद्‌भिद कहलाते है।

(d) वायुमण्डलीय गैसे:- पृथ्वी की सतह से लगभग 15 किमी तक की वायु मौसम, जलवायु, जीव आदि को प्रभावित

करती है। वायुमण्डल मे – N2 = 78%, O2= 21%, CO2= 0.03%

(e) वायु गति:- वायु की गति का प्रभाव पादपो की आकृति एवं वितरण पर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनो ही रूप में पड़ता है। तेज वायु द्वारा मृदा अपरदन, अधिक वाष्पोत्सर्जन व वाष्पीकरण वृक्षो के टूटने का प्रमुख कारण है। वायु, परागण तथा फलो व बीज प्रकीर्णन मे भी सहायक होती है।

(f) मृदीय कारक या मृदा:- स्थलीय पौधे जल तथा खनिज तत्वो को मृदा से ही प्राप्त करते हैं। मृदा में पाये जाने वाले सूक्ष्मजीव पौधो पर विशेष प्रभाव डालते है। पृथ्वी के चट्टानो के टूटने-फूटने से बनने वाली उसकी ऊपरी परत को मृदा कहते है। मृदा में मुख्य अवयव खनिज पदार्थ, मृदा जल, मृदा – वायु और जीव आदि है।

मृदा के आधार पर वनस्पतियो को निम्न वर्ग में विभाजित किया गया है:-

अम्लोद्‌भिद:- जो पौधे अम्लीय मृदा मे उगते है, अम्लोद्‌भिद कहलाते है।

लवणोद्‌भिद:-जो पौधे लवणीय मृदा मे उगते है, लवणोद्‌भिद कहलाते है।

बालूकोद्‌भिद:- जो बालू मे उगते हैं, बालूकोद्‌भिद कहलाते है।

शैलोद्‌भिद:- चट्टानो की सतह के पौधो को शैलोद्‌भिद कहते है।

दारारोद्‌भिद:- चट्टानो की दरारो मे उत्पन्न पौधे दारारोद्‌भिद कहलाते है।

अजीवीय कारको के प्रति अनुक्रियाये:- किसी जीव के बहा बातावरण के साथ साम्यावस्था व सन्तुलन तथा प्रतिकूल वातावरणीय परिवर्तनो के बावजूद भी शरीर का स्थिर अनुकूल अन्तः वातावरण को बनाए रखने की क्षमता को समस्थापन कहते है।

बहुत से जीवधारी अपने शरीर की स्थिति वातावरण में बनाए रखने मे सक्षम नही होते हैं। तनावयुक्त अजैविक कारको से निपटने के लिए ये जीव निम्न क्रिया-कलापो का सहारा लेते हैं –

1. नियन्त्रण या नियमन करना:- कुछ जीवधारी शरीर ताप व परासरणीय सान्द्रता को स्थिर बनाये रखने मे सक्षम होते है तथा समस्थैतिकता को बनाये रखते है।

उदाहरण – स्तनधारी, पक्षी आदि ।

2. संरूपण रखना:- लगभग 99% जीव या पौधे किसी स्थिर अनुकूल अन्तः वातावरण को बनाए रखने में सक्षम नही होते है तथा उनमे ताप नियन्त्रण क्रियाविधि का भी अभाव होता है, ऐसे जीव उष्माक्षेपी, शीत रुधिर वाले या विषमतापी होते है।

3. प्रवास करना:- भोजन, अनुकूलन, मौसम, आवास एवं अन्य कारको से एक समष्टि द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान के लिए गमन मुख्यतया प्रवास कहलाता है। ये दैनिक कालिक मौसम के अनुसार भी हो सकता है। मौसम अभिगमन या प्रवास का अच्छा उदाहरण है।

4. निलंबित करना:- जीवाणु, कवक निम्न पौधे विपरीत परिस्थिति से बचने के लिए मोटी भित्ति वाले बीजाणुओ को उत्पन्न करते है जैसे ही अनुकूल दशा आती है, ये अंकुरण करते है। उच्च जीव भी अपना अस्तित्व बचाने के लिए अनुकूल वातावरण का चयन करते है। जैसे- शीत ऋतु मे ध्रुवीय भालू शीत निष्क्रियता में चले जाते हैं।

मछलियाँ एवं घोघे ग्रीष्म ऋतु मे सम्बन्धित ताप तथा जलशुष्कन जैसी परिस्थितियो से बचाने के लिए ग्रीष्म निष्क्रियता मे चले जाते है।

अजीवीय कारको के प्रति अनुक्रियाये

जीवो मे पारिस्थितिकीय अनुकूलन

वातावरण मे होने वाले परिवर्तनो को सहन करने के लिये जीवो के शरीर मे आकारिकीय एवं शारीरिकीय परिवर्तन होते हैं, जिन्हे पारिस्थितिकीय अनुकूलन कहते हैं। पादपो और जन्तुओ में विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिकीय अनुकूलन देखने को मिलते है।

पादपो मे परिस्थितिकीय अनुकूलन

पादपो मे पाये जाने वाले पारिस्थितिकीय अनुकूलनो जल एवं लवणो की अलब्धता के आधार पर पादपो को निम्न परिस्थितिकीय समूहों में बाँटा गया है।

जलोद्‌भिद् पादप:-

ऐसे पादप, जो जल मे पूर्ण रूप से डूबे रहते हैं, उन्हे जलोदभिद आप पादप कहते है।

अपने आवास व स्वभाव के आधार पर जलोद्‌भिद पादप भी तीन प्रकार के होते है :-

(i) जल निमग्न पादप:- ये पादप जल मे पूर्ण रूप से डूबे होते है। इनके दो प्रकार होते है-

  • (a) जडयुक्त निमग्न पादप:- इस प्रकार के पादपो की जड़े कीचड में धँसी होती है तथा पादप पूरी तरह से जल में डूबे होते है। उदा० → हाइड्रिला, पोटामोजेटान, वैलिसनेरिया इत्यादि ।
  • (b) निमग्न प्लावी पादप:- इस प्रकार के पादपों मे जड़रहित पादपो का पूरा शरीर जल के अन्दर डूबा होता है। उदा० = सिरैटो फिल्लम, यूट्रीकुलेरिया आदि ।

(ii) प्लावी पादप:- ये पादप जल की सतह पर तैरते हुए पाये जाते है। इनके दो प्रकार होते है:-

(iii) जलस्थलीय पादप: इन पादपों का कुछ भाग (पत्तियाँ) जल के बाहर रहता है तथा शरीर का कुछ भाग (जड़ व तना) जल मे डूबा होता है। इन पादपो में दो प्रकार की पत्तियाँ पाई जाती है जिसके कारण इनमें विषमपर्णता देखी जा सकती है। उदा०:- टाइफा, सेजिटेरिया, जलधनिया या रेननकुलस आदि ।

जलोद्‌भिद पादपो मे आकारिकी अनुकूलन

जलोद‌भिद पादपो की जडो, तनो व पत्तियो में आकारिकीय अनुकूलन निम्नलिखित है:-

(i) जडो मे अनुकूलन:- जडो मे निम्न अनुकूलन पाए जाते है:-

  • इस प्रकार के पादपो का शरीर जल के सम्पर्क मे होता है, जिसके जल अवशोषण की जरूरत कम होती है। उदा० → वॉल्फिया, सिरेटोफिल्लम
  • कई पादपो जैसे – लेम्ना मे रेशेदार, शारवाविहीन, छोटी उपस्थित होती है। ये पादप का संतुलन बनाए रखने तथा तैरने में सहायता करती है।
  • सिंघाडा मे पायी जाने वाली स्वांगीकारक जड़ का रंग हरा होने के कारण प्रकाश संश्लेषण क्रिया करती है।

(ii) तनो मे अनुकूलन:- तनो मे निम्नलिखित अनुकूलन पाए जाते है:-

  • जल मे डूबे रहने वाले पादपो के तने पतले, स्पंजी तथा कोमल होते है जिसके कारण ये जल के बहाव से सुरक्षित रहते है।
  • स्थिर प्लावी पादपो मे धरातल पर फैलने वाले पाये जाते है। – जैसे कुमुदनी, कमल।
  • स्वतंत्र प्लावी पादपो मे तने कोमल, पतले तथा जल मे सतह पर क्षैतिज तैरने वाले होते हैं। जैसे- एजोला

(iii) पत्तियो मे अनुकूलन:- पत्तियो में निम्न अनुकूलन पाए जाते है:-

जलनिगम्न पादपो जैसे- सिरेटोफिल्लम की पत्तियाँ महीन व कटीफटी रहती है। वैलिसनेरिया की पत्तियाँ लम्बी तथा फीतेनुमा रहती है। जलकुम्भी की पत्तियाँ सडने से बचने के लिए मोम जैसे पदार्थ की पतली परत पाई जाती है।

जो पत्तियाँ जल की सतह पर तैरती रहती है वे आकार मे बडी होती है तथा इनकी ऊपरी सतह पर मोम पदार्थ की परत होती है।

जलोद्‌भिद पादपो मे शारीरिकीय अनुकूलन

जलोदभिद पादपों मे निम्न शारीरिकीय अनुकूलन पाये जाते है:-

  • (i) जलीय पादपो की बाहरी त्वचा मृदूतकीय होती है तथा इस पर उपत्वचा अनुपस्थित होती है, परन्तु तैरने वाले कुछ पादपो जैसे कुमुदनी की पत्तियो की बाहा त्वचा पर मोम पदार्थ की परत होती है।
  • (ii) जल निमग्न पादपो की पत्तियो पर रन्ध्र नही पाये जाते है। प्लावी पादपो की पत्तियो पर रन्ध्र ऊपरी सतह पर उपस्थित होते है तथा जलस्थलीय पादपो की जल के बाहर उपस्थित पत्तियो की दोनी सतह पर रन्ध्र पाये जाते है।
  • (iii) जड़ो व तनो मे वल्कुट मृइतको का बना होता है तथा सुविकसित अवस्था मे उपस्थित होता है।
  • (iv) यान्त्रिक ऊतक बहुत ही कम मात्रा मे पाया जाता है।
  • (v) जलनिमग्न पादपो मे दारु तथा पोषवाह विकसित नही होता है परन्तु जलस्थलीय पादपो मे ये ज्यादा विकसित होते हैं।
  • (vi) पर्णहरिम तने के वल्कुट तथा तने व पत्तियो की बाह्य त्वचा पर उपस्थित होते हैं। उदाहरण हाइड्रीला ।

समोद्‌भिद या मध्योद्‌भिद

ये पादप ऐसे जगहो पर ऐते उगते है, जहाँ औसत जल तथा ताप पाया जाता है। ऐसे जगहो जल की जलवायु न ज्यादा शुष्क और न ही ज्यादा नम होती है। इन जगहो पर मृदा मे खनिज लवण, जल आक्सीजन व अन्य पोषक पदार्थ अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। ये मरुद्‌भिद् व जलोद्‌भिद के बीच की स्थिति को दर्शाते है। उद्यानो मे लगाये जाने वाले पादप इसी श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं। इस प्रकार के पादपो में परिस्थितिकीय अनुकूलन निम्न प्रकार के पाए जाते है:-

  • (i) इन पादपो का मूलतन्त्र या जड तन्त्र सुविकसित होता है। इनकी जडो में मूलगोप व मूलरोम हमेशा पाये जाते हैं।
  • (ii) तना स्वतन्त्र रूप से शाखायुक्त, वायवीय, ठोस होता है।
  • (iii) पत्तियाँ पतली, चौड़ी, बडी, कई आकार की व मुलायम होती है तथा इसके ऊपर उपत्वचा की पतली परत होती है।
  • (iv) पत्तियों की निचली सतह पर ज्यादा रन्ध्र तथा ऊपरी सतह पर कम रन्ध्र होते हैं।
  • (v) बाह्य त्वचा सुविकसित होता है ।
  • (vi) पर्णमध्योतक, स्पंजी मृदूतक, व खम्भ ऊतक मे बंटा होता है।

शुष्कोद्‌भिद या मरुद्‌भिद

ये पादप ऐसे स्थानो पर पाये जाते है, जहाँ जल की कमी होती तथा शुष्कता की स्थिति बनी होती है। ऐसे जगहो की मृदा मे भौतिक शुष्कता उपस्थित होती है। इसके अतिरिक्त वायु की तेजी, अधिक ताप, आर्द्रता की कमी, प्रकाश की अधिकता आदि कारक भी जल की कमी कर देती है। इन पादपो मे ऐसी स्थिति मे ऐसे अनुकूलन पाये जाते है, जिनके कारण ये वाष्पोत्सर्जन की क्रिया को कम कर देते है तथा शरीर में जल संग्रहण किया जा सकता है। इन्ही विशेषताओ के कारण ऐसे पादप शुष्क परिस्थितियो में भी रह सकते हैं।

शुष्कोद्‌भिद या मरुद्‌भिद पादपो मे आकारिकीय अनुकूलन

पादपो की पत्तियो मे तनो मे व जड़ो मे निम्नलिखित आकारिकीय अनुकूलन पाए जाते है:-

(i) जडो मे अनुकूलन:-जडो मे निम्न अनुकूलन पाए जाते है –

  • इस प्रकार के पादपो मे मूलतन्त्र अधिक विकसित प्रकार का होता है।
  • जडे शाखिल, लम्बी व ज्यादा मूलरोम युक्त होती है तथा जल अवशोषण की क्षमता भी अधिक होती है।
  • कुछ पादपो की जडे ज्यादा गहराई मे न जाकर मृदा की सतह के थोड़ी नीचे ही फैली होती है ताकि जल की आवश्यकता होने पर उसे अवशोषित कर सके।उदा० नागफनी।
  • एस्पेरेगस मे जडे मॉसल होकर जल का संचय करती है।
  • एल्फाल्फा मे पादप की जड़े 130 फीट गहराई तक फैली रहती है।
  • नागफनी की जड़ की सिरो पर भी मूलरोम पाये जाते है।

(ii) तनो मे अनुकूलन:- तनो मे निम्न अनुकूलन पाये जाते है:-

  • इन पादपो का तना कष्ठीय, छोटा व मोटा छाल वाला होता है।
  • तनो पर रोम व कंटक उपस्थित होते है, जो वाष्पोत्सर्जन को कम करने का कार्य करते है।
  • कुछ पादपो का तना रूपान्तरित होकर मांसल व चौडा हो जाता है। जो कि पत्ती का कार्य करता है। ऐसे तने को पर्णाभ स्तम्भ कहा जाता है। जैसे:- रसकस तथा नागफनी ये प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा भोजन बनाते है।

(iii) पत्तियो मे अनुकूलन

पत्तियों में निम्न अनुकूलन पाये जाते है।

  • विभिन्न पादपो जैसे- यक्का, धीक्वार व जंगली केवड़े की पत्तियाँ, मोटी, मांसल व सरस हो जाती है जो जल संग्रहण का कार्य करती है। ऐसे मांसल पत्तीयुक्त पादपो को मृदुपर्णी मरुद्भिद कहा जाता है।
  • कई पादपो जैसे – पीपल, बरगद आदि की मोटी पत्तियाँ वाष्पोत्सर्जन को कम करने का कार्य करती है।
  • नागफनी मे पत्तियाँ रुपान्तरित होकर वाष्पोत्सर्जन की दर को कम कर देती है। जिससे जल की हानि कम हो सके।
  • प्रोसोपिस तथा बबूल में वाष्पोत्सर्जन की क्रिया को कम करने के लिए पत्तियाँ विखण्डित हो जाती है।
  • ऐकेसिया मिलेनोजाइलोन तथा पर्किन्सोनिया ऐक्यूनिएटा मे पर्ववृन्त चपटा हो जाता है तथा पत्ती के जैसा हो जाता है और प्रकाश संश्लेषण का कार्य करता है यह पर्णाभवृन्त कहलाता है।
  • इन पादपो की पत्तियाँ चिकनी व चमकदार होती है इसकी मदद से ये किरणो तथा ऊष्मा का परावर्तन करने का कार्य करती है।

शुष्कोद्‌भिद पादपो मे शारीरिकीय अनुकूलन

इन पादपो मे निम्न शारीरिकीय अनुकूलन पाये जाते है:-

  • (i) शुष्कोद्‌भिद पादपो के तनो व पत्तियो की बाह्य त्वचा पूर्ण रूप से विकसित होती है। अपवाद के रूप मे कनेर की बाह्यत्वचा बहुस्तरीय होती है।
  • (ii) बाह्य त्वचा पर उपचर्म की एक मोटी उपचर्म उपस्थित होती है। उदाहरण – कनेर, एगेव आदि ।
  • (ii) रन्ध्र निचली बाह्य त्वचा पर तथा कम संख्या मे उपस्थित होते है। रन्ध्र एगेव मे ऊपरी बाह्य त्वचा पर धँसी हुई तथा पादनस मे निचली बाह्य त्वचा में धँसी हुई पाई जाती है। ये रोमो द्वारा चारो ओर घिरे होते है। रोम रन्थ्रो को वायु के सम्पर्क मे आने से रोकने का कार्य करते है, जिससे वाष्पोत्सर्जन की दर कम होती है।
  • (iv) संवहन ऊतक विकसित होता है तथा दारु में लिग्निन अधिक मात्ता मे जमा होता है ।
  • (v) यान्त्रिक ऊतक ढढोतक कोशिकाओ का बना होता है। जिसके कारण ये अधिक विकसित होता है।
  • (VI) पत्तियो मे भी ढढोतक रेशे उपस्थित होते है जो पत्तियो को कमजोर होने पर भी उसे लटकने से रोकता है।
  • (VI) कई पादपो मे जल संग्रहण के लिए जल संचयी ऊतक भी पाया जाता है।

लवणोद्‌भिद

ऐसे स्थान जहाँ की मिट्टी मे मैग्नीशियम क्लोराइड (MgCl2), सोडियम क्लोराइड (NaCl2) तथा मैग्नीशियम सल्फेट (MgSo4) की सान्द्रता औसत से ज्यादा मात्रा मे पायी जाती है, उसे लवणीय मृदा कहते है। और इस प्रकार की मिट्टी मे उगने वाले पादपो को लवणोद्‌भिद् कहते है। कार्यिकीय रूप से लवणीय मृदा शुष्क होती है क्योंकि मृदा मे परासरण दाब उच्च होता है जिसके कारण पादप, मृदा से जल अवशोषित नही कर सकते।

लवणोद्‌भिद पादपो मे आकारिकीय अनुकूलन

इनमे निम्न आकारिकीय अनुकूलन पाए जाते है:-

(i) जडो मे अनुकूलन:- विभिन्न पादपो मे दो प्रकार की जड़े होती है- भूमिगत तथा वायवीय ।

वायवीय जड़े भूमिगत जड़ो से बनती है। कई पादपो मे भूमिगत जडो से विशिष्ट प्रकार की जड़े निकलती है जो ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्ती प्रदर्शित करती है तथा दलदली भूमि से ऊपर वायु मे निकल आती है।

इन खूँटी समान मूलो को श्वसन मूल कहा जाता है, जैसे सोनेरिया, राइजोफोरा, एवीसीनिया मे।

इन श्वसन मूल पर सूक्ष्म वातरन्ध्र उपस्थित होते है जो श्वसन क्रिया मे सहायता करते है।

(ii) तनो मे अनुकूलन:– तनो मे निम्न अनुकूलन पाये जाते है:-

पादपो का तना माँसल तथा मोटा होता है। तने की बाह्य त्वचा मोटी तथा इसके ऊपर उपचर्म का मोटा परत होता है। बाह्म त्वचा की कोशिकाओ मे तेल व टेनिन भरा हुआ होता है। बाह्य त्वचा के नीचे बहुस्तरीय अधस्त्वचा उपस्थित होती है।

(iii) पत्तियो मे अनुकूलन:- पत्तियो मे निम्न अनुकूलन पाये जाते है:-

  • पत्तियाँ गूदेदार होती है तथा पत्तियो पर उपत्वचा का मोटा आवरण उपस्थित होता है।
  • पत्तियाँ हमेशा हरी तथा मोटी व रसयुक्त होती है। कुछ पादपो मे पत्तियाँ पतली व छोटी आकार की होती है।
  • मैन्ग्रोव पादपो मे पितृस्थ अंकुरण या जरायुजता का गुण पाया जाता है। इन पादपो मे हमेशा फल मे ही बीज अंकुरित होकर नए पादप का निर्माण करते है। उदा०- राइजोफोरा मे ।

लवणोद्‌भिद पादपो मे शारीरिकीय अनुकूलन

इन पादपो मे निम्नलिखित अनुकूलन पाये जाते है:-

  • इन पादपो की भूमिगत जड़ो पर बहुस्तरीय कार्क उपस्थित होता है।
  • जडो के वल्कुट की कोशिकाएँ तारा कृति के समान होती है तथा इसमे तेल व टेनिन पदार्थ भरा रहता है। ये कोशिकाएँ आपस मे पार्श्व भुजाओ द्वारा सम्बन्धित होती है।
  • मज्जा कोशिकाओ की भित्ति रहती है तथा इसमे तेल व टेनिन पदार्थ का जमाव रहता है।
  • परिरम्भ दृढोतक से बनी बहुस्तरीय संरचना होती है।
  • बाह्य त्वचा की कोशिकाएँ मोटी रहती है जिसमे कैल्शियम ऑक्जेलेट के रोम उपस्थित होते है।
  • पत्तियो की दोनो सतहो पर उपत्वचा की मोटी परत उपस्थित होती है।

जन्तुओं मे पारिस्थितिकीय अनुकूलन

जीवो का गुण जो उसे जीवित रहने तथा जनन के लिए योग्य बनाता है उसे अनुकूलन कहते है।

जैसे- मछली के लिए जल तथा ऊँट के लिए मरुस्थल एक अनुकूलित जगह है।

जन्तुओं मे निम्न अनुकूलन पाए जाते है –

1. जलीय प्राणियो मे अनुकूलन:-

  • (i) ये पूर्ण रूप से जलीय होते है तथा स्वच्छ व समुद्री दोनो जल मे पाये जाते है।
  • (ii) कण्टको एवं शल्क का बना हुआ बाह्य कंकाल इनके शरीर के ऊपर पाया जाता है। इनका शरीर नौकाकार होता है, जो तैरने मे सहायता करते है।
  • (ii) इनमे – वायु थैली उपस्थित होते है, जो जल दाब को नियंत्रित करता है तथा जल की गहराई मे मछलियो को सुरक्षा प्रदान करता है।
  • (iv) इनमे युग्मित उपांग उपस्थित होता है, जो तैरने मे सहायक होते है।
  • (v) ये क्लोमो के माध्यम से श्वसन करते है जो जल मे घुलनशील आक्सीजन ग्रहण करते है।
  • (vi) इनमे हृदय द्विवेश्मी पाया जाता है अर्थात एक अलिन्द तथा एक निलय पाया जाता है, जिसमे हमेशा अनावसीकृत रुधिर बहता रहता है,
  • (vii) ये जन्तु अनियततापी होते है।

2. ठण्डे वातावरण के जन्तुओ मे अनुकूलन

  • (i) कई जीव ज्यादा ठण्ड से बचने के लिए ‘शीत दृढीकरण’ क्रिया का उपयोग करते हैं क्योंकि ये जीव ग्रीष्म निद्रा नही व्यक्त करते है। उदा०:- ठण्डे प्रदेशो के कई कीट तथा मकड़िया |
  • (ii) ऐलन के अनुसार ठण्डी जलवायु मे निवास करने वाले स्तनधारियो के कान व पाद अधिकतर छोटे रहते है ताकि ऊष्मा का क्षय कम हो ।
  • (iii) शरीर पर घने बाल होना जिसके द्वारा ऊष्मा की हानि कम होती है।
  • (iv) ठण्डे प्रदेशो के कई जीवो मे शीत निष्क्रियता देखी जाती है।

3. मरुद्‌भिद जन्तुओ मे अनुकूलन

  • (i) इन जन्तुओ को कम जल की जरूरत होती है क्योंकि ये जल की जरूरत की आन्तरिक वसा के आक्सीकरण से पूर्ण करते हैं।
  • (ii) कंगारु चूहा अपने उपापचय द्वारा निर्मित जल पर निर्भर करते है। यह कभी-भी जल ग्रहण नहीं करता है। इनमें उत्सर्जी पदार्थ समाप्त करने के लिए जल की बहुत कम आयतन की जरूरत होती है।
  • (iii) कई जीवो मे मूत्र को सान्द्रित करने की क्षमता पाई जाती है। जैसे- ऊँट
  • (v) मरुस्थल प्रदेशो में रहने वाले कई जीव ग्रीष्म निष्क्रियता प्रदर्शित करते है।
    • कंगारू – चूहे मे अनुकूलन:- उत्तरी अमेरिका के मरुस्थल मे कंगारु – चूहा अपनी जल की जरूरत की पूर्ति अपनी आन्तरिक वसा के आक्सीकरण से पूर्ण करने में समर्थ है।

समष्टियाँ (population)

एक ही जाति के जीवो के समूह को समष्टि कहते है। यह जीवीय समुदाय की इकाई कहलाती है। जैसे मानव की समष्टि। पादप पारिस्थितिकी की वह शाखा जिनके अन्तर्गत एक ही प्रजाति के समूह एवं इनके पर्यावरण के बीच होने वाली पारस्परिक क्रियाओ का अध्ययन किया जाता है तो इसे समष्टि पारिस्थितिकी कहते है।

समष्टि के लक्षण:-

(a) समष्टि आकार और समष्टि घनत्व – किसी समष्टि का आधारभूत लक्षण उसका घनत्व माना जाता है। किसी विशेष क्षेत्रफल मे उपस्थित सजीव की संख्या को समष्टि घनत्व कहते है।

\(समष्टि घनत्व का सूत्र=\frac{जीवो की कुल संख्या (N)}{छेत्र(S)}\)

(b) जन्मदर: सजीवी द्वारा नये जीव को जन्म देना जन्मदर कहलाता है।

(c) मृत्युदर:- एक निश्चित समय मे जनसंख्या मे से जितने जीव मर जाते है, उसे मृत्युदर कहते है।

(d) लिंग अनुपात:- समष्टि का दूसरा विशेष गुण है लिंग अनुपात। समष्टि मे नर व मादा के अनुपात को लिंग अनुपात कहते हैं।

आयु पिरैमिड:- समष्टि के लिए आयु वितरण आलेखित किया जाता है तो निर्मित होने वाली संरचना को आयु पिरैमिड कहते हैं। पिरैमिड तीन प्रकार के होते हैं।

  • बढ़ता हुआ
  • स्थिर
  • घटता हुआ
समष्टि

समष्टि वृद्धि:- समष्टि वृद्धि को प्रभावित करने वाले कारक निम्न है –

  • (a) जन्मदर – किसी समष्टि मे नये जीवो के उत्पन्न होने के दर को ही जन्मदर कहते है।
  • (b) मृत्युदर – यह दी गई अवधि समष्टि में पायी जाने वाली मौतो की संख्या है।
  • (c) आप्रवासन – प्रजाति के वे जीव, जो दिए गए समय मे अन्य स्थान से इस आवास मे आ गए है।
  • (d) उत्प्रवासन:- प्रजाति के वे जीव, जो दिए गए समय मे इस आवास को छोड़कर किसी अन्य आवास मे चले गए है।

आवास, सूक्ष्म आवास तथा निकेत

1. आवास

आवास वह भौतिक स्थान है, जहाँ कोई जीवधारी, समष्टि या समुदाय मे बसता है जो अजैविक या पर्यावरणीय कारको से मिलकर बना है।

आवास के लक्षण :-

  • (i) यह कुल पर्यावरणीय कारक है जो किसी विशेष स्थान पर किसी जनसंख्या या समुदाय की स्थिति का निर्धारण करता है।
  • (ii) आवास चीटी की आँत के समान बहुत छोटा तथा वन के समान बहुत बड़ा भी हो सकता है।

आवास की किस्मे

  • (i) कार्बनिक पदार्थो की बहुलता वाले गैसीय जल की धाराओ मे ट्यूबीफेक्स नामक एनीलिड पाये जाते है।
  • (ii) आक्सीजन रहित जल मे काइरोनोमस के लार्वा पाये जाते है।
  • (iii) घास के मैदानो तथा काष्ठीय मैदानो मे खरगोश पाया जाता है।
  • (iv) भारतीय समुद्री तटी मे भारतीय शर्क पाई जाती है।
  • (V) ताजे पानी के धाराओ मे कैटफिश पायी जाती है।

(2) सूक्ष्म आवास

किसी आवास के उप-विभाग जिनमे अलग-अलग पर्यावरणीय दशाएँ होती है तथा अनेक प्रकार के जीव उपस्थित होते हैं, जिसे सूक्ष्म आवास कहते हैं।

उदा. कीचड युक्त तल, तालाब की सतह, खेत का कोना आदि ।

(3) पारिस्थितिकीय निकेत

प्रत्येक जीव जाति विशेष कार्य एवं आवास ग्रहण करती है। कार्य, क्रियाशीलता एवं आवास के सम्मिश्रण को पारिस्थितिकीय निकेत कहते हैं।

(i) स्थानीय या मावासीय निकेत:- यह जीवी द्वारा भौतिक स्थान को प्रदर्शित करता है।

(ii) पोषण निकेत:- यह पारितन्त्र में जीव की कार्य करने की स्थिति की दर्शाता है।

(iii) जीवनस्वरूप निकेत:- भिन्न स्तर के शारीरिक संगठन वाले पादप भली प्रकार से साथ रहते हैं। जैसे वृक्ष और शाक या वृक्ष एवं झाडियाँ ।

(iv) पुनरुद्‌भवन निकेत:- पादपो के बीज, वर्धी या कायिक प्रजनन इकाईयो के अंकुरण की परिस्थितियो या समय की भिन्नता के कारण साथ रहने वाली जातियो में कुछ जातियाँ एक स्थान पर अधिक प्रभावी होती है, इसे पुनरुद्‌भवन कहते है।

महत्त्व:- पारिस्थितिक निकेत रहने के स्थान के लिए होने वाले लगातार संघर्ष से बचने मे मदद करता है। ये जाति के उप- जाति मे विभेदीकरण मे सहायक होते हैं।

समष्टि पारस्परिक क्रियाये

प्रकृति में प्राणी, पादप और सूक्ष्मजीव अलग- अलग नही रह पाते है बल्कि जैव समुदाय का निर्माण करने के लिए कई तरीको से परस्पर क्रिया करते है।

ये क्रियाएँ एक या दोनो जाति के लिए लाभदायक या हानिकारक हो सकती है या उदासीन भी हो सकती है।

लाभदायक क्रियाओ के लिए ‘+’ चिन्ह तथा हानिकारक के लिए ‘-‘ चिन्ह और उदासीन को ‘0’ से प्रदर्शित किया जाता है।

जाति Aजाति BName of Intinctions
++राहोपकारिता
स्पर्धा
+परभक्षण
+परजीविता
+oसहयोजिता
oअन्तर जातीय परजीविता

सहोपकारिता:- इस पारस्परिक क्रिया मे दोनो जीवो को लाभ होता है, उसे सहोपकारिता कहते है। जैसे- लाइकेन मे कवक व शैवाल एक दूसरे से लाभ प्राप्त करते है।

स्पर्धा:- जीवो के बीच स्थान, जल, भोजन, खनिज-लवण के लिए तथा अन्य संसाधनों के लिए स्पर्धा होती है। इसमे दोनो जीवी को हानि होती है।

एक ही जाति के जीवो के बीच स्पर्धा अन्तराजातीय स्पर्धा व भिन्न जाति के जीवो के बीच स्पर्धा अन्तरजातीय स्पर्धा कहलाती है।

परिभक्षण:- यह दो जातियो के मध्य अस्थायी पारस्परिक सम्बन्ध है, जिसमे एक जाति के जीव दूसरे जाति के जीव को मारकर भोजन के रूप मे खाता है। इसमे एक जीव को लाभ व दूसरे जीव को हानि होता है।

परभक्षण के कार्य:-

  • परभक्षण के द्वारा ऊर्जा का स्थानान्तरण एक जीव से दूसरे जीव में होता है।
  • अनेक परभक्षियो का उपयोग पीडको के जैव नियन्त्रण में किया जाता है।
  • परभक्षण जातियो के विभिन्नता को बनाए रखता है।
  • कुछ पादपो मे काँटे होने के कारण परभक्षी इन्हे खा नही पाते है। जैसे- बबूल, नागफनी

परजीविता:- जब कोई जीव अपना भोजन दूसरे सजीव से प्राप्त करता है तो उसे परजीविता कहते है।

परजीवी दो प्रकार के होते है:-

(a) बाह्य परजीवी:- वे परजीवी जो अपना भोजन परपोषी की बाहरी सतह से ग्रहण करते है, उसे बाह्य परजीवी कहते है। उदा० – जूँ मनुष्य पर, कुत्तों पर चिडचिडिया, अमरबेल आदि ।

(b) अन्तः परजीवी:- वे परजीवी जो परपोषी के शरीर में अलग-अलग जगहो जैसे- लाल रुधिर कड़िका, यकृत, फेफडे आदि मे पाये जाते है, उन्हे अन्तः परजीवी कहते है।

सहभोजिता:- ऐसी पारस्परिक क्रिया जिसमे एक जाति को लाभ होता है दूसरे जीव को न लाभ होता है न हानि।

अन्तर्जातीय परजीविता:- अन्तर्जातीय परजीविता में एक जाति को हानि तथा दूसरी जाति अप्रभावित रहती है।

कठलताएँ:- ये काष्ठीय आरोही होते है। कुछ ऐसे पौधे होते है, जो उनकी जड़े जमीन से निकल कर लेकिन वह दूसरे पौधे पर लिपट कर बहुत ऊपर चले जाते है और पेड़ो के ऊपर फैलकर सूर्य का प्रकाश ग्रहण करते है उसे कठलताएँ कहते हैं। जैसे टीनोस्पोरी आदि।

अधिपादप:- ऐसे पौधे जो दूसरे पौधो के तनो शाखाओ आदि पर उगते है, लेकिन उनसे भोजन ग्रहण नहींकरते है। ऐसे पौधे को अधिपादप कहते है। जैसे – वैन्डा, मॉस तथा फर्न।

प्रतिजीवित:- यह एक जीवधारी का दूसरे जीवधारी हेतु पूर्ण या आंशिक निरोध होता है। इसमे एक जीव कुछ ऐसे पदार्थ उत्पन्न करता है जो दूसरे जीव की वृद्धि की मागे बढ़ने से रोकता है।

Chapter 1 जीवो मे जन
Chapter 2 पुष्पी पौधो में लैंगिक जनन
Chapter 3 मानव जनन
Chapter 4 जनन स्वास्थ्य
Chapter 5 वंशागति एवं विविधता के सिद्धांत
Chapter 6 वंशागति का आणविक आधार
Chapter 7 विकास
Chapter 8 मानव स्वास्थ्य तथा रोग
Chapter 9 खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति

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