Class 12 Chemistry Chapter 1 Notes in Hindi ठोस अवस्था (Free PDF Download)

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Class 12 Chemistry Chapter 5 Notes in Hindi ठोस अवस्था

ठोस अवस्था: पदार्थ की वह अवस्था जिसमें उसका आकार एवं आयतन निश्चित रहता है, ठोस अवस्था कहलाता है

वे पदार्थ जिसकी आकार एवं आयतन निश्चित होता है, ठोस पदार्थ कहलाता है

ठोस अवस्था के गुण :-

  • प्रत्येक ठोस अवयवी कणों से मिलकर बनता है। ये अवयवी कण अणु, परमाणु या आयन होते हैं।
  • ये अच्छे से दबाकर पैक किया गया) अर्थात निबिड है तथा असपीड्य होते हैं अतः ठोस कठोर होते हैं।
  • ठोस के अवयवी कणों के मध्य रिक्त स्थान कम होता है । इनकी स्थिति स्थिर बनी रहती है। अत: ठोस का आयतन निश्चित होता है।
  • इनका घनत्व गैस तथा द्रव की तुलना में अधिक होता है (d=M/V)
  • इनका गलनांक प्राय: अधिक होता है।
  • ये माध्य स्थिति के सापेक्ष दोलन करते हैं।

ठोस पदार्थ दो प्रकार का होता है :-

1. क्रिस्टलीय ठोस(Crystalline Solid):- वे ठोस जिसके अवयवी कणों का क्रम निश्चित होता क्रिस्टलीय ठोस पदार्थ कहलाता है। उदा०: नमक, नौसादर (WHKCE), आयोडीन, नीला थोथा (cusou), चीनी, हीरा, ग्रेफाइट आदि।

क्रिस्टलीय पदार्थ के गुण

  • ज्यामिति निश्चित होती है।
  • विषमदैशिक होता है ।
  • गलनांक निश्चित होता है ।
  • अवयवी कणों की निश्चित दीर्घ परास में व्यवस्था होती है।

2. अक्रिस्टलीय ठोस (Amorphous solid) : पदार्थ जिसके अवयवी कणों का क्रम नियमित नहीं होता, अक्रिस्टलीय ठोस पदार्थ कहलाता है। उदा०: प्लास्टिक, कॉच, सिलिका, रबर आदि।

अक्रिस्टलीय पदार्थ के गुण:-

  • ज्यामिति निश्चित नहीं होती है।
  • समदैषिक होता है।
  • गलनांक निश्चित नहीं होता है।

क्रिस्टलीय ठोस पदार्थ तथा अक्रिस्टलीय ठीस पदार्थ में अंतर:

क्रिस्टलीय पदार्थअक्रिस्टलीय पदार्थ
इसके अवयवी कण व्यवस्थित होते हैं।इसके अवयवी कण व्यवस्थित नहीं होते हैं।
 इसका गलनांक निश्चित होता है।इसका गलनांक निश्चित नहीं होता है।
यह विषलदैनिक होता है।यह समदैषिक होता है
इसका शीतलन वक्र असंतत होता हैइसका शीतलन वक्र संतत होता है
इसे वास्तविक ठोस माना जाता हैइसे अतिशीतित द्रव माना जाता है
इसके अवयवी कणों की दीर्घ परास में व्यवस्था होती है।इसके अवयवी कणों की लघु परास में व्यवस्था होती है।

सम दैशिकता :- ठोसों के भौतिक गुण जैसे-अपवर्तनांक,विद्युत, ऊष्मा की चालकता, यांत्रिक सामर्थ्य आदि के मान किसी ठोस में अलग-अलग दिशाओं से ज्ञात करने पर यदि ये मान समान आते हैं तो इन्हें सम दैशिक ठोस कहते हैं और इस गुण को समदैशिकता कहते हैं

विषम दैशिक:- ठोस के मौतिक गुण जैसे- विद्युत, ऊष्मा,अपवर्तनाक, यांत्रिक सामर्थ्य आदि के मान किसी ठोस मे अलग-अलग दिशाओं से ज्ञात करने पर यदि ये मान समान नहीं आते है उन्हें विषमदैशिक ठोस कहते है तथा इस गुण को विषमदैशिकता कहते है।

ठोसों में बंद संकुलन(Close Packing in Crystals)

ठोसों में बंद संकुलन एक क्रिस्टल जालक में उसके घटक कणों (अणुओं, परमणुओं या आयनों की त्रिविम में निश्चित व्यवस्था को बंद सकुलन कहते हैं

बंद संकुलन के प्रकार

ठोस में बंद संकुलन

  1. द्विविमीय बंद संकुलन
    • वर्ग बंद संकुलन(SCP)
    • षट्कोणीय बंद संकुलन
  2. त्रिविमीय बंद संकुलन
    • षट्कोणीय बंद संकुलन
    • घनीय बंद संकुलन

द्विविमीय बंद संकुलन

वर्ग बंद संकुलन(Square Close packing)

द्विविमीय (समतल) में गोलाकार परमाणु इस प्रकार से व्यवस्थित रहते हैं कि प्रत्येक गोले को अन्य चार गोला स्पर्श करती है। इन चारों गोलों के केन्द्रों को मिलाने पर एक वर्ग बनता है तो इस संकुलन को वर्ग बंद संकुलन कहते हैं। इस प्रकार के संकुलन प्रत्येक गोले की समन्वय संख्या 4 तथा संकुलन क्षमता 52.4% है।

षष्टकोणीय बंद संकुलन

समतल सतह पर गोलाकार परमाणु इस प्रकार व्यवस्थित रहते है कि प्रत्येक गोले को अन्य दः गोले स्पर्श करते हुए घेरे रहते हैं। इन छः गोले के केंद्रों को मिलाने पर षट्भुज बनता है तो इस प्रकार के संकुलन की षष्टकोणीय बंद संकुलन कहते हैं। इस प्रकार के संकुलन में प्रत्येक गोले की सकुलन समन्वय संख्या 6 तथा क्षमता 60.4% है।

त्रिविमीय बंद संकुलन

षष्टकोणीय बंद संकुलन(Hexagamal Close Packing)

जब ठोसों में संघटक कण (अणु, परमाणु या आयन) इस प्रकार से व्यवस्थित रहते हैं कि समतल सतह पर एक अन्य छः गोलों को घेरती है तब उसमें छः दिन हैं। इन छः छिद्रों के ऊपर तथा नीचे तीन-तीन गोले आ सकते हैं जिन तीन छिद्रों के ऊपर तीन गोले आते हैं उन्हीं तीन छिद्रों के नीचे तीन गोले आते हैं तो इस प्रकार के संकुलन को षट्कोणीय बंद संकुलन कहते हैं। इस प्रकार के संकुलन में प्रत्येक गोले की समन्वय संख्या 12 तथा संकुलन क्षमता 74.है।

धनीय बंद संकुलन

जब ठोसो में उसके संघटक कण (अणु , परमाणु या आपन) इस प्रकार से व्यवस्थित रहते हैं कि एक गोले को अन्य छः गोले स्पर्श करते हुए घेरे रहते है तब उनमें छः छिद्र बनते हैं। जिन तीन छिद्रों के ऊपर तीन गोले आते हैं उनको छोड़कर अन्य तीन छिद्रों के नीचे तीन गोले आते हैं तो इस प्रकार के संकुलन को घनीय बंद संकुलन कहते हैं। इस प्रकार के संकुलन में प्रत्येक गोले को समन्वय संख्या 12 तथा संकुलन क्षमता 74% है।

ठोसो का वर्गीकरण(Classification of Crystals):-

क्रिस्टल के अवयवी कणों को बाँधे रखने वाले बन्धों के आधार पर हम क्रिस्टल की चार प्रकार से वर्गीकृत करते हैं-

i. आयनिक क्रिस्टल

ऐसे क्रिस्टल जिनके अवयवी कण  धनायन और ऋणाआपन होते हैं जिनके बीच आपस में स्थिर वैद्युत आकर्षण बल होता है,आयनिक क्रिस्टल कहलाते हैं। उदा०- KOH, KCl, Nacl, cuSo4

ii. सहसंयोजी क्रिस्टल

 ऐसे क्रिस्टल जिनके अवयवी कण परमाणु होते हैं जिनके बीच आपस में सहसंयोजी बंध से जुड़े होते हैं, सहसयोजी क्रिस्टल कहलाते हैं।

उदा- हीरा, ग्रेफाइट |

iii. आण्विक क्रिस्टल

ऐसे क्रिस्टल  जिनके अवयवी कण अणु होते है जो आपस में दुर्बल वाण्डर वॉल आकर्षण बल से जुड़े होते हैं ।

उदा- ठोस Co2,अक्रिय गैसें ।

iv. धात्विक क्रिस्टल

ऐसे धात्विक क्रिस्टल जिसमें इलेक्ट्रॉन के समुद्र में धातु धनाआपन उपस्थित रहते हैं जो आपस में धात्विक बंध से जुड़े होते हैं।
उदा० सभी धातुएँ

  1. ये कठोर, आपातवर्ज्यनीय तथा तन्य होते हैं।
  2. धातुओं में विशिष्ट चमक उनमें उपस्थित मुक्त तथा गतिशील इलेक्ट्रॉन के कारण होती है ।
  3. इनके गलनांक व क्वथनांक उच्च होते हैं
  4. धातुओं में प्रत्यास्थता का गुण होता है ।
  5. मुक्त इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति के कारण ये ऊष्मा तथा सुचालक होता है ।
अभिलक्षणआयनिक ठोससहसंयोजी ठोसआण्विक ठोसधात्विक ठोस
संघटक कणधनायन एवं ऋणायनपरमाणुअणुधनायन एवं गतिशील इलेक्ट्रॉन
आबंधनस्थिर वैद्युत आकर्षण बलसहसपोजी बंधदुर्बल वाण्डर-वॉल बलधात्विक बंध
भौतिक गुणकठोर एवं भंगुरकठोरसामान्यतः मृदुआघातवर्धनीय एवं तन्य  
गलांकअति उच्चउच्च अति निम्नपर्याप्त उच्च
वैद्युतचालनठोस अवस्था में विद्युत रोधी विद्युतरोधी किंतु गलित अवस्था में चालक  विद्युतरोधी (ग्रेफाइट)  विद्युतरोधीठोसा एवं बालित दोनों अवस्थाओ में चालक
संगलन की एन्थेल्पीअति उच्चउच्चअति निम्नमध्यम
उदाहरण CuSO4, KCl, Nacl,हीटा, ग्रेफाइट,क्वार्ट्ज (SiO2) , सिलिकॉन कार्बाइड(sic)  ठोस CO2, I2 लेफ्थेलीन, Ar,बर्फ Cu, Ag, Fe, Al , Mg
  • त्रिविग (क्रिस्टल) :- त्रिविम में किसी क्रिस्टल के एककों (इकाई कोशिका) की नियमित व्यवस्था को त्रिविम (क्रिस्टल) जालक कहते हैं।
  • इकाई कोशिका :- किसी क्रिस्टल का वह सरलतम रूप जिसकी बार-बार पुनरावृत्ति से जालक का निर्माण होता है।
  • जालक बिंदु :- क्रिस्टल जालक में कणों के द्वारा ग्रहण किए गए स्थान को जालक बिंदु कहते है ।
  • समन्वय संख्या :- किसी क्रिस्टल के किन्हीं अवयवी कण को पैरे हुए अन्य कणों की संख्या उसकी समन्वय संख्या कहते हैं।

घनीय इकाई कोशिका (Cubic Unit cell)

  • साधारण घनीय इकाई कोशिका (Simple Cubic Umit cell): वे घनीय इकाई कोष्ठिका जिसके केवल कोणों पर ही कण (परमाणु, अणु या आयन) होते हैं। इसके निर्माण में एक कण का योगदान होता है। इसका संकुलन गुणांक 52.4% होता है। इसकी समन्वय संख्या 6 है। इसकी परमाणु की त्रिज्या a/2 है।.
  • फलक केन्द्रित इकाई कोष्टिका (face centered unit cell): वे घनीय इकाई कोष्ठिका जिसके कोणों के अतिरिक्त फलक के केन्द्र पर भी कण ( परमाणु, अणु या आयन) होते है। इसके निर्माण में 4 कणों का योगदान होता है। इसका संकुलन गुणांक 74% होता है। इसके परमाणु की त्रिज्या a/2√2 होती है। इसकी समन्वय संख्या 12 है।
  • अन्तः केन्द्रित इकाई कोष्ठिका (Body centered umit call): वे घनीय इकाई कोष्ठिका जिसके कोणों के अतिरिक्त फल केन्द्र पर भी कण (परमाणु, अणु या आयन) होते हैं। इसके निर्माण में परमाणुओं की संख्या 2 है। इसकी संकुलन क्षमता 68% है। इसकी समन्वय संख्या 8 है। इसकी त्रिज्या  √3/4a होती है।

क्रिस्टल दोष (Crystal Defect):

दोष (Defect) या अपूर्णता (Imperfection): किसी क्रिस्टल में परमाणुओं के पूर्ण रूप से नियमित क्रम में कोई विचलन अपूर्णता या दोष कहते हैं।

बिन्दु दोष (Paint Defect):- किसी परमाणु अथवा आयन के अपने नियमित स्थान से लुप्त हो जाने के कारण अथवा अवस्थित हो जाने के कारण उत्पन्न दोष को बिंदु दोष कहते है।

यह निम्न तीन प्रकार का होता है-

1. रससमीकरणमितीय दोष:- जब किसी क्रिस्टल जालक में दोष उत्पन्न होने के पश्चात् उनके आयनों के अनुपात में कोई परिवर्तन नहीं होता है तो इस प्रकार उत्पन्न दोष रससमीकरमितीय दोष है।

यह दो प्रकार होता है-

  • शाट्की दोष(Schottky Defect): जब किसी आयनिक क्रिस्टल जालक में एक धनायन एवं ऋणायन समान अनुपात मे रिक्त रहता है तो इस प्रकार का दोष को शाट्की दोष कहते हैं।
  • फ्रेंकेल दोष(Frenkel Defect): जब किसी आयनिक क्रिस्टल जालक मे उनका एक धनायन अपना मूल स्थान रिक्त कर अन्तराकाशी स्थान में स्थापित हो जाता है तो इस प्रकार उत्पन्न दोष को फ्रेंकेल दोष कहते है।

2. अरससमीकरणमितीय दोष (Nanstaichiametric Defect)

जब किसी क्रिस्टल जालक में दोष उत्पन्न होने पश्चात उनके आयनों के अनुपात में परिवर्तन हो जाता है तो इस प्रकार के उत्पन्न दोष को अरससमीकरणमितीय दोष कहते है।

यह दो प्रकार का होता है-

  • ऋणायन रिक्ति दोष (Anion Vacancier defect):- जब किसी आयनिक क्रिस्टल जालक में उनके ऋणायन का स्थान रिक्त रहता है तथा उस स्थान पर इलेक्ट्रॉन स्थित रहता है तो इस प्रकार के दोष को ऋणायन रिक्ति दोष कहते हैं। ऋणायन रिक्ति से बँधे  इलेक्ट्रॉन को F-केन्द्र कहते है जिसके कारण क्रिस्टल रंगीन हो जाता है। यह दोष उन क्रिस्टलों में पाया जाता है जिनके धनायनो तथा ऋणायनों आकार लगभग समान तथा समन्वय संख्या उच्च होती है॥
  • अन्तराकाशी स्थान में अतिरिक्त धनायन दोष- जब किसी आयनिक क्रिस्टल जालक मे उसके अन्तराकाशी स्थान में कोई धनायन अपने इलेक्ट्रॉन के साथ स्थापित हो जाता है तो इस प्रकार के उत्पन्न दोष को अन्तराकाशी स्थान में अतिरिक्त धनायन दोष कहते है।

यह दोष उन क्रिस्टलों में पाई जाती है जिनके धनायनों तथा ऋणायनों के आकार में काफी अंतर तथा समन्वय सम संख्या निम्न होती है।

3. अयुद्धता दोष (Impurity Defect):- जब किसी क्रिस्टल में अशुद्धि मिलाकर दोष उत्पन्न कराई जाती है तो इस प्रकार उत्पन्न दोष को अशुद्धता दोष कहते हैं।

यह दो प्रकार का होता है-

(i) उदासीन परमाणु अशुद्धता दोष :- जब किसी सहसंयोजक क्रिस्टल जालक में अल्प मात्रा में उदासीन परमाणु की अशुद्धि मिला दी जाती है तो इस प्रकार उत्पन्न दोष को उदासीन परमाणु अशुद्धता दोष कहलाता है। इस प्रकार अशुद्धि मिलाने की क्रिया को डोपिंग कहते हैं। इससे अर्धचालकों का निर्माण होता हैं।

यह दो प्रकार का होता है –

  • N- प्रकार अर्धचालक :- जब IVA वर्ग के तत्व (Si, Ge) के क्रिस्टल जालक में अल्प मात्रा में VA वर्ग के तत्व (P, As, Sb) मिलाकर दोष उत्पन्न कराई जाती है। इसमें मुक्त इलेक्ट्रॉन होने के कारण यह इलेक्ट्रॉन दाता के रूप में कार्य करता है। अतः इसे N- प्रकार अर्धचालक कहते हैं।
  • P- प्रकार अर्धचालक :- जब IVA वर्ग के तत्व (si, Ge) के क्रिस्टल चालक में अल्पमात्रा में (IIIA) वर्ग के तत्व (Al, Ga) मिलाकर दोष उत्पन्न काया जाता है। इसमें इलेक्ट्रॉन की कमी या छिद्र होने के कारण यह इलेक्ट्रॉन ग्राही के रूप में कार्य करता है। अतः इसे p प्रकार का अर्धचालक कहते है।

(ii) आयनिक अशुद्धता दोष:- किसी आयनिक क्रिस्टल जालक में दूसरे आयन जिसकी संयोजकता अधिक होती है की अशुद्धि मिलाने पर उत्पन्न दोष आयनिक अशुद्धि दोष कहते है ।

  • धातु के तार पर ताप बढ़ाने पर उसकी चालकता में कमी आ जाती है।
  • ‘अर्धचालकों में ताप बढ़ाने पर उसकी चालकता में वृद्धि हो जाती है।
  • आयनिक चालकों में ताप बढ़ाने पर उसकी चालकता वृद्धि हो जाती है क्योंकि आयनों की बहने की गति बढ़ जाता है।

N प्रकार – P प्रकार अर्धचालक:- N-Type तथा P-Type अर्धचालकों के युग्म से अर्धचालक युक्त का निर्माण होता है। जिसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में किया जाता है। इसका उपयोग डायोड, ट्रांजिस्टर, आइ सी आदि बनाने में किया जाता है ।

अतिचालकता(Superconductor)- वे चालक जिसमें विद्युत धारा का प्रवाह पूर्ण रूप से होता है अर्थात जिसका प्रतिरोध शून्य होता है, अतिचालक पदार्थ कहलाता है तथा इस घटना को अतिचालकता कहते है।

अर्धचालक(Semiconductor):- वे चालक जिसमें केवल एक ही दिशा में विद्युतधारा का प्रवाह पूर्ण रूप से होता है। अर्धचालक कहलाता है। ताप बढ़ाने पर इसकी चालकता में वृद्धि होती है

  • इसकी खोज सन् 1913 में कैमर लिंग ओन्स ने किया था। उन्होंने 4k ताप पर पारा को ठण्डा कर अतिचालक प्राप्त किया।
  • उनके अनुसार इसकी चालकता 106 प्रति ओम प्रति सेमी के लगभग होता है तथा ये प्रति- चुंबकीय होते है।
  • वह न्यूनतम ताप जिससे कम ताप पर कोई पदार्थ अति चालक होता है, संक्रमण ताप कहलाता है।
  • उदा०. नियोबियम के कुछ संकर लवण अतिचालक होते हैं Nb3Ge आदि। सामान्य ताप पर कोई भी अतिचालक नह प्राप्त किए जा सके हैं।
  • नोट:- अतिचालक प्रतिचुम्बकीय प्रकृति के होते है।

ठोसो के चुंबकीय गुण

सभी पदार्थों में कुछ चुंबकीय गुण अवश्य होते हैं. इन चुंबकीय गुणों की उत्पत्ति इलेक्ट्रॉनों के कारण होती है। एक परमाणु में प्रत्येक इलेक्ट्रॉन एक अति सूक्ष्म चुक्क की तरह व्यवहार करता है। पदार्थ के चुंबकीय गुणो का अध्ययन उसके चुम्बकीय आघूर्ण से किया जाता है। चुंबकीय आपूर्ण की उत्पत्ति इलेक्ट्रॉनों की दो प्रकार की गतियों से होती है।

  1. नाभिक के चारों ओर कक्षकीय गति
  2. अपने अक्ष के चारों चक्रण गति

पदार्थों में पाँच प्रकार के चुम्बकीय गुण पाए जाते है-

(I) अनुचुंबकीय (paramagnetic):- वे पदार्थ जो बाहा चुम्बकीय क्षेत्र की तरफ आकर्षित होते हैं, अनुचुंबकीय पदार्थ कहलाते हैं। इन पदार्थों के परमाणु, अणु या आयनो मे अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं। चुंबकीय क्षेत्र से हटा लेने पर इनका चुबकत्व समाप्त हो जाता है।

उदा० O2, Ti0, Cu+2, Fe+3, Cuo, Mn, Cr+3

(II) प्रति चुंबकीय (Diamagneti). वे पदार्थ जो बाहा चुंबकीय क्षेत्र से प्रतिकर्षित होते हैं, प्रतिचुबकीय पदार्थ कहलाते हैं। इन पदार्थों के परमाणु, अणु या आयनो में सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं। इन दोनों इलेक्ट्रॉनों का चुंबकीय आघूर्ण एक-दूसरे के प्रभाव को निरस्त कर देता है।

उदा०:Cu+, K+, Mg+2 , NaCl, Zn, H2o

(III) लौह चुंबकीय पदार्थ (Ferromagnetic):- वे पदार्थ जो बाहा चुंबकीय क्षेत्र द्वारा आकर्षित होते हैं, लौह चुंबकीय पदार्थ कहलाते हैं। इन पदार्थों के परमाणु मे अयुग्मित इलेक्ट्रॉनो की संख्या अधिक तथा संरेखन एक ही दिशा में होता है।

चुंबकीय क्षेत्र से हटा लेने पर भी ये चुबकत्व दर्शाते रहते है।

उदा०: Fe, No. Co

(IV) प्रति लौह चुंबकीय पदार्थ (Antiferramagnetic)

जब बराबर संख्या में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन विपरीत दिशा में संरेखित होते हैं तो उनके चुम्बकीय आपूर्ण (e-चक्रण) एक दूसरे को निरस्त कर देते हैं। ऐसे पदार्थ को प्रतिलौह पुंबकीय पदार्थ कहते हैं

उदा०: Fe3O4, MnO2, MnO, Mn2o3, Feo

(V) लघु लौह चुम्बकीय पदार्थ (Ferrimagnetic)

जब अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या असमान विपरीत दिशा में संरेखित होता है किन्तु परिणामी चुंबकीय आपूर्ण शून्य नहीं होता है। ऐसे पदार्थ को लघु लौह चुंबकीय पदार्थ कहते है।

उदा०:- Fe3o4, MgFe2O4, ZnFe2O4

विभिन्न प्रकार के क्रिस्टल तंत्र

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Intensititial Voids (रिक्तियाँ)

किसी क्रिस्टल की संरचना में अक्यवी कणी के मध्य कुछ रिक्त स्थान बच जाते हैं, जिन्हें अन्तराकाशी रिक्तियाँ कहते हैं। यह तीन प्रकार की होती हैं-

(I) त्रिकोणीय रिक्तियाँ :-

एक ही तल में उपस्थित तीन परमाणुओं के मध्य बनी रिक्तियाँ त्रिकोणीय रिक्तियाँ कहलाती है।

(II) चतुष्फलकीय रिक्तियाँ

चतुष्फलक के कोनों के मध्य पर गोले होते हैं और उन चारों गोलों के मध्य जो खाली स्थान होता है, उसे चतुष्फलकीय रिक्ति कहते हैं। चतुष्फलक में रिक्तियों की संख्या 2N होती है।

(III) अष्टफलकीय रिक्तियाँ

अष्टफलक के छः कोनों पर गोले होते हैं और उन छः गोले के मध्य जो खाली स्थान होता है, वह अष्टफलकीय रिक्ति कहलाती हैं। अष्टफलक में रिक्तियों की संख्या N होती है।

Packing efficiency(संकुलन क्षमता)

(1) साधारण घनीय इकाई कोष्ठिका:- 52.4%

(2) फलक केन्द्रित घनीय इकाई कोष्ठिका:- 74%

(3) अतः केन्द्रित घनीय इकाई कीष्ठिका (BCC) : 68%

त्रिज्या अनुपात – किसी भी आयनिक क्रिस्टल में उनके धनायन और ऋणायन के त्रिज्याओ के अनुपात को त्रिज्या अनुपात कहते हैं।

त्रिज्या अनुपात = r+/r

इकाई कोष्ठिका घनत्व : D = ZM/a3NA

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